गीता मार्ग · 12.14
अन्तर्मन की सन्तुष्टि
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः। मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥
भगवद्गीता 12.14 का अर्थ क्या है?
जो सदा सन्तुष्ट है, जिसने अपने मन को जीत लिया है, जो दृढ़ निश्चय वाला है और जिसने अपना मन और बुद्धि मुझे अर्पित कर दी है, वह भक्त मुझे प्रिय है।
गीता 12.14 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?
खुशी बाहरी चीजों से नहीं, बल्कि एक पक्के इरादे से आती है। जब हम अपने मन को यह समझा देते हैं कि हमारे पास जो है वह भगवान का दिया हुआ प्रसाद है, तब हमें वह शान्ति मिलती है जो दुनिया की कोई भी दौलत नहीं दे सकती।
कृष्ण की शिक्षा
श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि ईश्वर को पाने का रास्ता अपनी इच्छाओं के शोर को थामने में है।
संकल्प
मैं अपनी सन्तुष्टि में ही ईश्वर का सबसे सुन्दर आशीर्वाद महसूस करता हूँ।
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