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गीता मार्ग · 13.27

एकता की दृष्टि

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्। विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥

भगवद्गीता 13.27 का अर्थ क्या है?

जो सभी नाशवान प्राणियों में अविनाशी परमेश्वर को समान रूप से देखता है, वही वास्तव में देखता है।

गीता 13.27 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?

हम अक्सर लोगों को उनके शरीर, नाम या काम से पहचानते हैं। लेकिन यह श्लोक कहता है कि सबके भीतर एक ही दिव्य ऊर्जा है। जब हम यह समझ लेते हैं, तो भेदभाव और नफरत अपने आप खत्म हो जाते हैं।

कृष्ण की शिक्षा

श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि एकता की दृष्टि ही आत्मज्ञान का शिखर है।

संकल्प

सबके भीतर की अमर आत्मा को मेरा नमन है।

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