गीता मार्ग · 16.3
धैर्य और विनम्रता
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता। भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥
भगवद्गीता 16.3 का अर्थ क्या है?
तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता और विनम्रता—ये दैवी स्वभाव वाले मनुष्य के लक्षण हैं।
गीता 16.3 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?
दूसरों को माफ कर देना और कठिन समय में धीरज बनाए रखना, ये गुण हमें परमात्मा के करीब ले जाते हैं। जब हम अपने बड़े होने का घमण्ड नहीं करते और विनम्र बने रहते हैं, तभी हम जीवन में वाकई कुछ सार्थक हासिल कर पाते हैं।
कृष्ण की शिक्षा
श्रीकृष्ण बताते हैं कि क्षमा का गुण ही मनुष्य को महानता की ऊंचाइयों तक ले जाता है।
संकल्प
मेरा धीरज और मेरी विनम्रता मुझे दिव्यता के और करीब ला रही है।
सुझाव या प्रतिक्रिया दें · 16.3