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गीता मार्ग · 18.71

श्रवण का फल

श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः। सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्॥

भगवद्गीता 18.71 का अर्थ क्या है?

जो मनुष्य श्रद्धा के साथ और बिना किसी द्वेष के केवल इस गीता ज्ञान को सुनता भी है, वह भी पापों से मुक्त होकर शुभ लोकों को प्राप्त होता है।

गीता 18.71 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?

गीता का ज्ञान केवल पढ़ने के लिए नहीं, महसूस करने के लिए है। जब हम खुले मन और श्रद्धा से इन वचनों को सुनते हैं, तो हमारे भीतर एक सकारात्मक बदलाव आने लगता है। यह ज्ञान हमारे जीवन को संवारने की ताकत रखता है।

कृष्ण की शिक्षा

श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति श्रद्धा और विश्वास के साथ, बिना दोष-दृष्टि के भगवद्गीता के दिव्य ज्ञान को सुनता है, वह भी उसके शुभ फल का अधिकारी बनता है। इसलिए परमात्मा के ज्ञान को श्रद्धापूर्वक सुनना और उसे जीवन में उतारने का प्रयास करना स्वयं में एक महान पुण्य है।

संकल्प

मैं श्रद्धा, विनम्रता और खुले मन के साथ परमात्मा के दिव्य ज्ञान को सुनता और समझता हूँ। मैं उसमें दोष खोजने के बजाय उसके गहरे संदेश को अपने जीवन में अपनाकर अपने विचारों और कर्मों को श्रेष्ठ बनाने का प्रयास करता हूँ।

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