गीता मार्ग · 2.14
धैर्य और सहनशीलता
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः। आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥
भगवद्गीता 2.14 का अर्थ क्या है?
हे कुन्तीपुत्र! इन्द्रियों और विषयों का संयोग ही सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख देने वाला है। ये आने-जाने वाले और अनित्य (अस्थायी) हैं, इसलिए हे भारत! इन्हें धैर्यपूर्वक सहन करो।
गीता 2.14 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?
जीवन में बुरा समय हमेशा नहीं रहता, जैसे सर्दी के बाद गर्मी आती है। जब हम यह समझ लेते हैं कि परिस्थितियाँ बदलती रहेंगी, तो हम छोटी-छोटी बातों से परेशान होना छोड़ देते हैं।
कृष्ण की शिक्षा
श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि सहनशीलता (तितिक्षा) ही मन को शान्त रखने की औषधि है।
संकल्प
सुख-दुःख की लहरों के बीच मैं भीतर से गहरा और शान्त हूँ।
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