🏠 गीता मार्ग
⚙

गीता मार्ग · 2.48

समता का योग

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥

भगवद्गीता 2.48 का अर्थ क्या है?

आसक्ति त्यागकर और सफलता-असफलता में समान रहकर योग में स्थित होकर कर्म करो। समता (सन्तुलन) ही योग है।

गीता 2.48 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?

हम अक्सर जीत में बहुत खुश और हार में बहुत दुःखी हो जाते हैं। यह श्लोक हमें एक ऐसी स्थिरता सिखाता है जहाँ बाहरी परिणाम हमें तोड़ नहीं पाते। सन्तुलित मन ही सबसे बड़ा योग है।

कृष्ण की शिक्षा

श्रीकृष्ण समझाते हैं कि कर्म की पूर्णता उसकी सफलता में नहीं, बल्कि उसे करने वाले के मन की शान्ति में है।

संकल्प

मेरा मन एक शान्त झील की तरह है, जहाँ सफलता-विफलता की लहरें विलीन हो जाती हैं।

सुझाव या प्रतिक्रिया दें · 2.48