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गीता मार्ग · 2.7

समर्पण और मार्गदर्शन

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः। यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥

भगवद्गीता 2.7 का अर्थ क्या है?

कायरता रूपी दोष से मेरा स्वभाव दब गया है और मैं धर्म के विषय में मोहित (भ्रमित) हूँ। मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में हूँ, कृपया मुझे निश्चित रूप से श्रेय (कल्याण) का मार्ग बताइए।

गीता 2.7 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?

जब जीवन में रास्ता न सूझे, तो खुद को अकेला न समझें। विनम्रता से किसी बड़े या ईश्वर से सलाह मांगना हमें सही दिशा में ले जाता है। समर्पण ही स्पष्टता का द्वार है।

कृष्ण की शिक्षा

श्रीकृष्ण बताते हैं कि जब शिष्य तैयार होता है, तभी गुरु का ज्ञान फलित होता है।

संकल्प

जब मैं किसी परिस्थिति में भ्रमित होता हूँ, तो मैं अहंकार छोड़कर सही मार्गदर्शन स्वीकार करता हूँ। मैं सत्य और कल्याणकारी मार्ग को समझने के लिए विनम्रता से सीखता हूँ।

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