गीता मार्ग · 5.22
क्षणभंगुर सुख
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते। आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥
भगवद्गीता 5.22 का अर्थ क्या है?
इन्द्रियों के बाहरी विषयों के सम्पर्क से मिलने वाले सुख अन्ततः दुःख के ही कारण होते हैं क्योंकि वे अस्थाई हैं। बुद्धिमान व्यक्ति उनमें सुख नहीं ढूंढता।
गीता 5.22 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?
अक्सर हम उन चीजों की ओर भागते हैं जो अभी तो सुख देती हैं, लेकिन बाद में पछतावा। यह श्लोक हमें 'मजे' और 'आनन्द' के बीच का फर्क समझाता है। सच्चा आनन्द भीतर से आता है, बाहर के क्षणिक सुखों से नहीं।
कृष्ण की शिक्षा
श्रीकृष्ण बताते हैं कि जो सुख शुरु होते हैं और खत्म हो जाते हैं, वे आत्मा को कभी तृप्त नहीं कर सकते।
संकल्प
मैं दिखावटी सुखों को छोड़कर उस आनन्द को चुनता हूँ जो कभी नहीं मरता।
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