गीता मार्ग · 6.5
स्वयं का उत्तरदायित्व
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
भगवद्गीता 6.5 का अर्थ क्या है?
अपने आप ही अपने द्वारा अपना उद्धार करें और स्वयं को पतन की ओर न ले जाएँ। मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु भी बन सकता है।
गीता 6.5 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?
आपके जीवन की दिशा आपके अपने हाथों में है। अपनी नकारात्मक सोच, गलत आदतों और गलत कर्मों से आप स्वयं ही अपने शत्रु बन सकते हैं; वहीं सकारात्मक सोच, सही कर्म और पुरुषार्थ के द्वारा स्वयं को ऊँचा उठाकर अपने जीवन को बेहतर बना सकते हैं।
कृष्ण की शिक्षा
श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि अपने उत्थान या पतन के लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी स्वयं हमारी है। इसलिए अपनी परिस्थितियों या असफलताओं के लिए दूसरों को दोष देने के बजाय, अपने विचारों, कर्मों और निर्णयों को सुधारने का प्रयास करना चाहिए।
संकल्प
मैं स्वयं का मित्र बन रहा हूँ। मैं अपनी सोच, कर्म और पुरुषार्थ के द्वारा स्वयं को निरंतर ऊँचा उठाने का प्रयास करता हूँ।
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