गीता मार्ग · 7.7
एकमात्र आधार
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय। मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥
भगवद्गीता 7.7 का अर्थ क्या है?
हे धनञ्जय! मुझ (परमात्मा) से श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है। यह सारा संसार मुझमें उसी प्रकार पिरोया हुआ है जैसे धागे में मणियाँ (मोती)।
गीता 7.7 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?
जीवन में जब भी आप अकेला या असुरक्षित महसूस करें, तो याद रखें कि आप एक विशाल ईश्वरीय शक्ति से जुड़े हुए हैं। जैसे धागा मोतियों को जोड़कर रखता है, वैसे ही ईश्वर हम सबको सम्भाले हुए हैं।
कृष्ण की शिक्षा
श्रीकृष्ण बताते हैं कि दिव्यता हमारे जीवन का अदृश्य आधार है, जो सबको एकता में बांधे रखती है।
संकल्प
मैं परमात्मा की अनन्त माला का एक अनमोल मोती हूँ।
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