गीता मार्ग · 8.7
सतत स्मरण
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च। मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥
भगवद्गीता 8.7 का अर्थ क्या है?
इसलिए तुम हर समय मेरा स्मरण करते रहो और अपने कर्तव्यरूपी युद्ध का पालन भी करो। अपने मन और बुद्धि को मुझमें अर्पित करके तुम निःसंदेह मुझे ही प्राप्त करोगे।
गीता 8.7 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?
यदि हमें परमात्मा को प्राप्त करना है, तो केवल संसार का त्याग करना आवश्यक नहीं है; अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए हर समय परमात्मा का स्मरण बनाए रखना चाहिए। जब हमारा मन और बुद्धि ईश्वर में समर्पित हो जाते हैं, तब जीवन की हर यात्रा हमें परमात्मा के और निकट ले जाती है।
कृष्ण की शिक्षा
श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि मनुष्य जिस भाव और विचार का निरंतर अभ्यास करता है, वही उसके मन में गहराई से बस जाता है और अंत समय में भी वही स्मरण में आता है। इसलिए जीवनभर अपने मन को परमात्मा के स्मरण में लगाना चाहिए और साथ ही अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करते रहना चाहिए।
संकल्प
खाते-पीते, सोते-जागते और चलते-फिरते, मेरे मन और मेरी जिह्वा पर निरंतर श्रीकृष्ण का पावन स्मरण बना रहता है। मैं अपने प्रत्येक कर्म को उन्हें समर्पित करते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करता हूँ।
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