गीता मार्ग · 11.33
निमित्त मात्र
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्। मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥
भगवद्गीता 11.33 का अर्थ क्या है?
इसलिए तुम उठो और यश प्राप्त करो! अपने शत्रुओं को जीतो और समृद्ध राज्य का भोग करो। ये सब तो पहले ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं, तुम तो केवल निमित्त मात्र बन जाओ।
गीता 11.33 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?
यह श्लोक हमें कर्म करने की प्रेरणा देता है, लेकिन अहंकार के बिना। जब हम यह समझ लेते हैं कि करने वाली शक्ति ईश्वर ही है, तो हम अपनी सफलताओं पर घमण्ड नहीं करते और असफलताओं से टूटते नहीं।
कृष्ण की शिक्षा
श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि अपना सर्वश्रेष्ठ कर्म करो, लेकिन कर्ता होने का बोझ ईश्वर को सौंप दो।
संकल्प
मैं स्वयं को अपने कर्मों का एकमात्र कर्ता नहीं मानता, बल्कि परमात्मा को ही सबका परम कर्ता मानता हूँ। मैं उनके हाथों में एक निमित्त बनकर अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ करता हूँ तथा परिणाम उन्हें अर्पित कर देता हूँ।
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