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गीता मार्ग · 11.32

समय की महाशक्ति

श्री भगवानुवाच कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः। ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥

भगवद्गीता 11.32 का अर्थ क्या है?

श्रीकृष्ण कहते हैं—मैं लोकों का नाश करने वाला महाकाल हूँ, जो इस समय बढ़कर जगत का संहार करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूँ। तुम्हारे बिना (युद्ध न करने पर) भी ये सब योद्धा जीवित नहीं रहेंगे।

गीता 11.32 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?

जब हमें यह समझ आ जाता है कि इस संसार में सब कुछ परमात्मा की दिव्य व्यवस्था के अनुसार घटित हो रहा है, तब हमें परिस्थितियों के प्रति अत्यधिक भय या अहंकार नहीं रखना चाहिए। हमें अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा से करते हुए परिणाम परमात्मा पर छोड़ देना चाहिए।

कृष्ण की शिक्षा

श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि काल के प्रभाव से इस संसार में परिवर्तन और विनाश निरंतर होते रहते हैं। इसलिए मनुष्य को न तो अपने कर्मों का अहंकार करना चाहिए और न ही भय के कारण अपने कर्तव्य से पीछे हटना चाहिए। हमें स्वयं को केवल परमात्मा के हाथों में एक निमित्त मानकर अपना धर्म और कर्तव्य निभाते रहना चाहिए।

संकल्प

समय की हर लहर मुझे सत्य और कर्तव्य की ओर ही ले जा रही है।

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