गीता मार्ग · 15.15
बुद्धि का आधार
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च। वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्॥
भगवद्गीता 15.15 का अर्थ क्या है?
मैं सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ। मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और विस्मृति (भूलना) आती है। सभी वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ।
गीता 15.15 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?
कभी-कभी हम अपनी बुद्धि पर बहुत घमण्ड करते हैं। यह श्लोक हमें विनम्र बनाता है कि हमारी समझ और याददाश्त भी उसी दिव्य शक्ति का उपहार है। जब हम ईश्वर से जुड़ते हैं, तो हमारी बुद्धि और अधिक प्रखर हो जाती है।
कृष्ण की शिक्षा
श्रीकृष्ण बताते हैं कि वे ही वह परम चेतना हैं जो सबके भीतर से कार्य कर रही है।
संकल्प
ज्ञान और याददाश्त का वह दिव्य स्रोत मेरे ही भीतर बह रहा है।
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