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गीता मार्ग · 15.7

दिव्य आत्मा

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥

भगवद्गीता 15.7 का अर्थ क्या है?

इस संसार में जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है। वही प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियों को अपनी ओर खींचता (सम्भालता) है।

गीता 15.7 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?

आप कभी भी खुद को कमजोर या छोटा न समझें। आप उसी महान शक्ति का हिस्सा हैं जिसने इस पूरे ब्रह्मांड को बनाया है। अपनी इस दिव्य पहचान को याद रखना ही हर समस्या का समाधान है।

कृष्ण की शिक्षा

श्रीकृष्ण बताते हैं कि हमारी आत्मा का मूल स्रोत परमात्मा ही है।

संकल्प

मैं परमात्मा की एक अविनाशी किरण हूँ, मेरी शक्ति असीम है।

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