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गीता मार्ग · 16.19

द्वेष का परिणाम

तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्। क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु॥

भगवद्गीता 16.19 का अर्थ क्या है?

उन द्वेष करने वाले, क्रूर और संसार के सबसे अधम मनुष्यों को मैं बार-बार संसार में आसुरी योनियों में ही डालता हूँ।

गीता 16.19 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?

यह श्लोक एक चेतावनी है। जब हम नफरत और हिंसा को अपना स्वभाव बना लेते हैं, तो हम खुद को दुख और अज्ञान के जाल में फँसा लेते हैं। दिव्य गुणों को अपनाना ही इस अन्धकार से बचने का मार्ग है।

कृष्ण की शिक्षा

श्रीकृष्ण कहते हैं कि द्वेष, क्रूरता और अधर्मपूर्ण आचरण मनुष्य को पतन की ओर ले जाते हैं। इसलिए जो व्यक्ति अपने जीवन का कल्याण चाहता है, उसे किसी के प्रति द्वेष नहीं रखना चाहिए और पापपूर्ण कर्मों से दूर रहकर धर्म और सदाचार के मार्ग पर चलना चाहिए।

संकल्प

मैं द्वेष, क्रोध और अधर्म के स्थान पर सभी के प्रति मित्रता, प्रेम और करुणा का भाव रखता हूँ। मैं अपने विचारों, वाणी और कर्मों से धर्म और सदाचार के मार्ग पर चलने का प्रयास करता हूँ।

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