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गीता मार्ग · 16.15

दिखावे का खालीपन

आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया। यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः॥

भगवद्गीता 16.15 का अर्थ क्या है?

वह सोचता है: 'मैं बहुत धनी और ऊँचे कुल का हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है? मैं दान दूँगा, यज्ञ करूँगा और मजे करूँगा।' ऐसे लोग अज्ञान के कारण भ्रमित रहते हैं।

गीता 16.15 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?

ऊँचे खानदान या बड़े बैंक बैलेंस का घमण्ड करना केवल मन का एक भ्रम है। यह श्लोक हमें दिखावे की दुनिया से बाहर निकालकर आन्तरिक सादगी की ओर ले जाता है। सच्चा बड़प्पन हमारे संस्कारों में है, हमारी संपत्ति में नहीं।

कृष्ण की शिक्षा

श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि धन, कुल, शक्ति या दान का अहंकार करने वाला व्यक्ति वास्तव में स्वयं को ही धोखा देता है। जब मनुष्य अहंकार और मोह में डूबकर स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है, तब वह अपने पतन का मार्ग स्वयं तैयार करता है।

संकल्प

मैं दिखावे के शोर से दूर, अपनी आन्तरिक पवित्रता में ही खुश हूँ।

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