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गीता मार्ग · 18.26

सात्त्विक कर्ता

मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः। सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥

भगवद्गीता 18.26 का अर्थ क्या है?

जो कर्ता आसक्ति और अहंकार से मुक्त है, धैर्य और उत्साह से युक्त है तथा कार्य की सफलता और असफलता में विचलित नहीं होता, वह सात्त्विक कर्ता कहलाता है।

गीता 18.26 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?

असली सफलता वह नहीं जो हमें अभिमानी बना दे, और असली हार वह नहीं जो हमें तोड़ दे। जब हम अपना काम पूरी लगन से करते हैं और परिणाम को ईश्वर पर छोड़ देते हैं, तब हम अहंकार से बचे रहते हैं।

कृष्ण की शिक्षा

श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि कर्म करने का उत्साह रखें, लेकिन उसके परिणाम के मालिक न बनें।

संकल्प

परिणाम चाहे जो हो, मेरा उत्साह और मेरा सन्तुलन अटल है।

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