गीता मार्ग · 18.30
विवेक की स्पष्टता
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये। बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी॥
भगवद्गीता 18.30 का अर्थ क्या है?
वह बुद्धि सात्त्विक है जो जानती है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं, किससे डरना चाहिए और किससे नहीं, क्या बन्धन है और क्या मोक्ष।
गीता 18.30 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?
अक्सर हम उन चीजों से डरते हैं जो वास्तव में डरावनी नहीं हैं। सही समझ हमें उस अनावश्यक डर से मुक्त करती है और हमें स्पष्ट निर्णय लेने में मदद करती है।
कृष्ण की शिक्षा
श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि जो बुद्धि हमें यह सही पहचान कराती है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, किससे भय करना उचित है और किससे नहीं, क्या बंधन है और क्या मोक्ष का मार्ग है—वही सात्त्विक बुद्धि कहलाती है। ऐसी शुद्ध और विवेकपूर्ण बुद्धि ही मनुष्य को सही निर्णय लेने और सात्त्विक कर्म करने की प्रेरणा देती है।
संकल्प
मैं सही समझ, विवेक और सात्त्विक बुद्धि प्राप्त करने के लिए निरंतर परमात्मा से प्रार्थना करता हूँ, ताकि मैं जीवन में सही और गलत के बीच उचित निर्णय ले सकूँ और धर्म के मार्ग पर चल सकूँ।
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