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गीता मार्ग · 18.39

तामसिक सुख का त्याग

यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः। निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्॥

भगवद्गीता 18.39 का अर्थ क्या है?

जो सुख शुरुआत में और अंत में भी आत्मा को भ्रम में डालने वाला है, जो निद्रा, आलस्य और लापरवाही से पैदा होता है, वह तामसिक सुख कहलाता है।

गीता 18.39 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?

ज्यादा सोना, काम टालना या मेहनत न करना शुरुआत में बहुत आरामदायक लगता है, लेकिन बाद में यही हमारी चिन्ता और असफलता का कारण बनता है। असली सुख परिश्रम और जागरूकता में है।

कृष्ण की शिक्षा

श्रीकृष्ण चेतावनी देते हैं कि जड़ता और आलस्य प्रगति के सबसे बड़े बाधक हैं।

संकल्प

मैं आलस के अन्धकार को चीरकर कर्म के नए सवेरे की ओर बढ़ रहा हूँ।

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