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गीता मार्ग · 18.58

अहंकार की चेतावनी

मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि। अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥

भगवद्गीता 18.58 का अर्थ क्या है?

यदि तुम मुझमें मन लगाओगे, तो मेरी कृपा से सब मुश्किलों को पार कर जाओगे। लेकिन यदि अहंकार के कारण तुम मेरी बात नहीं सुनोगे, तो तुम्हारा पतन निश्चित है।

गीता 18.58 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?

कभी-कभी हमें लगता है कि हम अकेले ही सब कुछ सम्भाल सकते हैं। यह अहंकार हमें दूसरों की अच्छी सलाह और ईश्वरीय मार्गदर्शन सुनने से रोकता है। समर्पण ही अहंकार को मिटाने का सबसे सरल मार्ग है।

कृष्ण की शिक्षा

श्रीकृष्ण कहते हैं कि अहंकार और 'मैं ही सब कुछ करता हूँ' की भावना को छोड़कर निरंतर मेरा चिंतन करो और अपने कर्म मुझे समर्पित करो। मेरी कृपा और स्मरण के सहारे जीवन की कठिनाइयों को पार किया जा सकता है। अहंकार का त्याग और परमात्मा पर पूर्ण विश्वास ही आत्मकल्याण के महान मार्गों में से एक है।

संकल्प

परमात्मा की असीम कृपा प्राप्त करने के लिए मैं अपने सभी कर्म करता हूँ, परंतु उनके फल और कर्तापन का अहंकार अपने भीतर नहीं रखता। मैं 'मैं, मैं' की भावना को छोड़कर स्वयं को परमात्मा का एक निमित्त मानता हूँ।

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