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गीता मार्ग · 18.61

हृदय का स्वामी

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥

भगवद्गीता 18.61 का अर्थ क्या है?

हे अर्जुन! ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हैं और अपनी माया के द्वारा सभी प्राणियों को उनके कर्मों और प्रकृति के अनुसार ऐसे संचालित करते हैं, मानो वे किसी यंत्र पर आरूढ़ हों।

गीता 18.61 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?

हमें लगता है कि हम ही सब कुछ कर रहे हैं, लेकिन वास्तव में हम एक विशाल दिव्य योजना का हिस्सा हैं। यह श्लोक हमें अहंकार छोड़कर ईश्वर पर भरोसा करना सिखाता. जब हम उस चालक (ईश्वर) पर विश्वास करते हैं, तो जीवन की यात्रा आसान हो जाती है।

कृष्ण की शिक्षा

श्रीकृष्ण बताते हैं कि हृदय में स्थित ईश्वर ही जीवन के असली संचालक हैं।

संकल्प

मैं स्वयं को केवल इस शरीर तक सीमित नहीं मानता। मेरे हृदय में स्थित परमात्मा अपनी दिव्य चेतना और कृपा से मेरे जीवन को जिस दिशा में ले जाएँ, मैं उस पर विश्वास रखता हूँ। वे मुझे जीवन में जैसा आकार और दिशा दें, मैं उसे श्रद्धा और विश्वास के साथ स्वीकार करता हूँ तथा उनके मार्गदर्शन पर पूर्ण भरोसा रखता हूँ।

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