🏠 गीता मार्ग
⚙

गीता मार्ग · 2.56

स्थिर मन की शक्ति

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः। वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥

भगवद्गीता 2.56 का अर्थ क्या है?

जो दुःख में विचलित नहीं होता और सुख की इच्छा नहीं करता, जिसके मन से राग, भय और क्रोध मिट चुके हैं, वह स्थिर बुद्धि वाला मुनि है।

गीता 2.56 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?

जीवन में उतार-चढ़ाव आना स्वाभाविक है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जब परिस्थितियाँ हमारे विपरीत हों, तब भी मन को शान्त रखना चाहिए। जब हम अपनी भावनाओं पर काबू पाते हैं, तब क्रोध हमें छू भी नहीं सकता।

कृष्ण की शिक्षा

कृष्ण सिखाते हैं कि स्थिर बुद्धि वाला व्यक्ति सुख में अत्यधिक आसक्त और दुःख में अत्यधिक विचलित नहीं होता। वह राग, भय और क्रोध पर नियंत्रण रखता है।

संकल्प

मैं सुख और दुःख दोनों परिस्थितियों में अपने मन को संतुलित रखता हूँ। मैं राग, भय और क्रोध से ऊपर उठकर स्थिर बुद्धि से निर्णय लेता हूँ।

सुझाव या प्रतिक्रिया दें · 2.56