गीता मार्ग · 2.60
चंचल इन्द्रियाँ
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः। इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥
भगवद्गीता 2.60 का अर्थ क्या है?
हे कुन्तीपुत्र! इन्द्रियाँ इतनी चंचल और प्रबल हैं कि वे संयम का प्रयत्न करने वाले बुद्धिमान मनुष्य के मन को भी जबरदस्ती अपनी ओर खींच लेती हैं।
गीता 2.60 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?
हमें कभी यह घमण्ड नहीं करना चाहिए कि हम पूरी तरह अनुशासित हैं। प्रलोभन किसी भी क्षण आ सकते हैं। यह श्लोक हमें हर पल सजग और सावधान रहने की चेतावनी देता है।
कृष्ण की शिक्षा
श्रीकृष्ण समझाते हैं कि आत्म-संयम कोई एक दिन का काम नहीं, बल्कि जीवन भर की सजगता है।
संकल्प
मैं अपनी इन्द्रियों और मन पर सजगता से नियंत्रण रखता हूँ। मैं क्षणिक आकर्षणों के बजाय अपने दीर्घकालिक लक्ष्य और सही मूल्यों को चुनता हूँ।
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