गीता मार्ग · 2.70
अचल शान्ति
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्। तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥
भगवद्गीता 2.70 का अर्थ क्या है?
जैसे चारों ओर से नदियों के जल से भरे जाने पर भी समुद्र विचलित नहीं होता और अपनी मर्यादा में स्थिर रहता है, वैसे ही जिस मनुष्य में सभी इच्छाएं समाहित हो जाती हैं (वह प्रभावित नहीं होता), वही शान्ति पाता है।
गीता 2.70 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?
दुनिया में बहुत सारे आकर्षण और प्रलोभन हैं। अगर हम हर इच्छा के पीछे भागेंगे, तो कभी शान्त नहीं रह पाएंगे। समुद्र की तरह गहरा और विशाल बनें, जहाँ लहरें आती तो हैं पर उसकी गहराई को हिला नहीं पातीं।
कृष्ण की शिक्षा
श्रीकृष्ण बताते हैं कि आन्तरिक स्थिरता ही इच्छाओं पर विजय पाने का मार्ग है।
संकल्प
मेरे भीतर इच्छाएँ आ सकती हैं, लेकिन मैं उनका गुलाम नहीं हूँ। मैं अपनी इच्छाओं को सजगता से देखता हूँ और अपने मन की शांति को प्राथमिकता देता हूँ।
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