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गीता मार्ग · 2.71

परम शान्ति

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः। निर्ममो निरहंकारः स शांतिमधिगच्छति॥

भगवद्गीता 2.71 का अर्थ क्या है?

जो व्यक्ति अपनी सभी इच्छाओं को छोड़ देता है, जो ममता और अहंकार से रहित होकर जीता है, वही सच्ची शान्ति प्राप्त करता है।

गीता 2.71 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?

सभी दुःखों की जड़ 'मैं' और 'मेरा' की आसक्ति है। जब भीतर से 'मैं' और 'मेरा' का भाव धीरे-धीरे मिटने लगता है, तब पूरा संसार अपना-सा लगने लगता है और मन में गहरी शांति का अनुभव होता है।

कृष्ण की शिक्षा

श्रीकृष्ण कहते हैं कि सच्ची शांति का मार्ग इच्छाओं और आसक्तियों से मुक्त होने में है। 'मैं' और 'मेरा' के अहंकार को छोड़कर, अपनी अनंत इच्छाओं पर संयम रखो और जो है, उसमें संतोष पाना सीखो।

संकल्प

मैं 'मैं' और 'मेरा' की आसक्ति को धीरे-धीरे छोड़ रहा हूँ। मैं इच्छाओं के पीछे भागने के बजाय संतोष, आत्मसंयम और आंतरिक शांति को चुनता हूँ। मैं जो मेरे पास है, उसे स्वीकार करता हूँ और बिना आसक्ति के अपने कर्म करता हूँ।

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