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गीता मार्ग · 3.20

समाज सेवा का योग

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः। लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि॥

भगवद्गीता 3.20 का अर्थ क्या है?

राजा जनक जैसे महापुरुषों ने भी कर्म के द्वारा ही परम सिद्धि प्राप्त की। लोक-कल्याण (समाज सेवा) को ध्यान में रखते हुए भी तुम्हें कर्म करना चाहिए।

गीता 3.20 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?

हमारा जीवन केवल हमारे लिए नहीं है। हम जो भी काम करते हैं, उसका समाज पर प्रभाव पड़ता है। दूसरों के लिए प्रेरणा बनना और समाज के हित में काम करना ही जीवन को सार्थक बनाता है।

कृष्ण की शिक्षा

श्रीकृष्ण बताते हैं कि निस्वार्थ लोक-कल्याण ही कर्मयोग की पराकाष्ठा है।

संकल्प

मेरा जीवन जगत के कल्याण के लिए एक समर्पित भेंट है।

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