गीता मार्ग · 4.13
स्वभाव और कर्म
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः। तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्॥
भगवद्गीता 4.13 का अर्थ क्या है?
गुणों और कर्मों के विभाग के अनुसार चारों वर्णों की रचना मेरे द्वारा की गई है। यद्यपि मैं इसका कर्ता हूँ, फिर भी मुझे वास्तव में अकर्ता ही जानो।
गीता 4.13 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?
आपकी वास्तविक पहचान इस बात से नहीं होती कि आपका जन्म किस वर्ण में हुआ है, बल्कि आपके विचारों, गुणों और आपके कर्मों से होती है। अपने गुणों और कर्मों के द्वारा आप स्वयं को ऊँचा उठा सकते हैं।
कृष्ण की शिक्षा
श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि मनुष्य की पहचान केवल उसके जन्म से नहीं, बल्कि उसके गुण और कर्मों से होती है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्म करने की स्वतंत्रता है; इसलिए अपने श्रेष्ठ गुणों और अच्छे कर्मों के द्वारा वह स्वयं को उन्नत कर सकता है।
संकल्प
मैं अपने भीतर छिपी दिव्य प्रतिभा को सेवा के लिए निखार रहा हूँ।
सुझाव या प्रतिक्रिया दें · 4.13