🏠 गीता मार्ग
⚙

गीता मार्ग · 4.8

सत्य की विजय

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥

भगवद्गीता 4.8 का अर्थ क्या है?

सज्जनों की रक्षा करने, दुष्टों का विनाश करने और धर्म की पुनः स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।

गीता 4.8 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?

कभी-कभी लगता है कि बुरे लोग जीत रहे हैं, लेकिन यह श्लोक याद दिलाता है कि अंत में जीत सत्य की ही होती है। ईश्वर का काम केवल सजा देना नहीं, बल्कि व्यवस्था को वापस सही करना है।

कृष्ण की शिक्षा

भगवान सज्जनों की रक्षा करने, दुष्ट प्रवृत्तियों का विनाश करने और धर्म की पुनः स्थापना करने के लिए युग-युग में प्रकट होते हैं।

संकल्प

मैं अच्छाई की विजय में पूर्ण विश्वास रखता हूँ और निडर हूँ।

सुझाव या प्रतिक्रिया दें · 4.8