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गीता मार्ग · 4.10

डर से मुक्ति

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः। बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥

भगवद्गीता 4.10 का अर्थ क्या है?

जो राग, भय और क्रोध से पूरी तरह मुक्त हो चुके हैं, जो मुझमें अनन्य भाव से स्थित हैं और मेरी शरण में हैं, वे ज्ञान की तपस्या से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त होते हैं।

गीता 4.10 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?

डर हमें आगे बढ़ने से रोकता है। यह श्लोक सिखाता है कि जब हम ईश्वर पर विश्वास करते हैं और अपने भीतर की बुराइयों (गुस्सा और लगाव) को छोड़ते हैं, तो हमारा मन शुद्ध और निडर हो जाता है।

कृष्ण की शिक्षा

श्रीकृष्ण बताते हैं कि शुद्ध मन ही दिव्यता का अनुभव कर सकता है।

संकल्प

मैं राग, भय और क्रोध से मुक्त होकर अपने मन को शुद्ध और स्थिर करता हूँ। मैं ज्ञान, आत्मसंयम और साधना के माध्यम से अपने भीतर की शांति को विकसित करता हूँ।

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