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गीता मार्ग · 5.10

कमल के समान जीवन

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः। लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥

भगवद्गीता 5.10 का अर्थ क्या है?

जो व्यक्ति अपने सभी कर्मों को परमात्मा को समर्पित कर देता है और आसक्ति छोड़कर कर्म करता है, वह पापों से उसी प्रकार अछूता रहता है जैसे कमल का पत्ता जल में रहकर भी गीला नहीं होता।

गीता 5.10 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?

दुनिया में रहें, काम करें, रिश्ते निभाएं, लेकिन मन से हमेशा ईश्वर से जुड़े रहें। जब आप 'मेरा' भाव छोड़कर 'ईश्वर का' भाव अपनाते हैं, तो जीवन की बुराइयाँ आप पर असर नहीं कर पातीं।

कृष्ण की शिक्षा

जो व्यक्ति अपने सभी कर्मों को भगवान को अर्पित करके और उनके फल की आसक्ति का त्याग करके करता है, वह कर्मों के बंधन से उसी प्रकार अछूता रहता है, जैसे कमल का पत्ता जल से अछूता रहता है।

संकल्प

मैं अपने प्रत्येक कर्म को पूरी निष्ठा से करता हूँ और उसके परिणाम की आसक्ति छोड़कर अपने कर्मों को भगवान को अर्पित करता हूँ।

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