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गीता मार्ग · 5.18

समान दृष्टि

विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥

भगवद्गीता 5.18 का अर्थ क्या है?

ज्ञानी महापुरुष एक विद्वान ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और एक चाण्डाल में भी समान रूप से उस परमात्मा को ही देखते हैं।

गीता 5.18 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?

सच्चा ज्ञान हमें विनम्र बनाता है और दूसरों के प्रति सम्मान से भर देता है। जब हम बाहरी भेदों (जाति, रूप, पद) से ऊपर उठकर आत्मा को देखते हैं, तो हमारे भीतर सबके प्रति करुणा जागती है।

कृष्ण की शिक्षा

श्रीकृष्ण बताते हैं कि समदर्शिता ही आध्यात्मिक परिपक्वता का सबसे बड़ा लक्षण है।

संकल्प

हर चेहरे में मुझे उस एक ईश्वर की ही झलक दिखाई देती है।

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