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गीता मार्ग · 9.30

नई शुरुआत

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥

भगवद्गीता 9.30 का अर्थ क्या है?

यदि कोई बहुत बुरा आचरण करने वाला व्यक्ति भी अनन्य भाव से मुझे भजता है, तो उसे साधु ही मानना चाहिए क्योंकि उसने सही निश्चय कर लिया है।

गीता 9.30 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?

गलतियाँ किसी से भी हो सकती हैं, लेकिन जो अपनी गलती सुधारने का निर्णय लेता है, वह महान है। यह श्लोक हमें कभी निराश न होने और हमेशा एक नई शुरुआत करने की प्रेरणा देता है।

कृष्ण की शिक्षा

श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति अपने अतीत में कितने ही बुरे कर्म कर चुका हो, फिर भी यदि वह अनन्य भाव से मेरी भक्ति करता है और अपने जीवन को सही दिशा में ले जाने का दृढ़ संकल्प करता है, तो उसे साधु और सदाचारी मानना चाहिए। क्योंकि उसका निश्चय अब सही मार्ग पर चलने का है।

संकल्प

मेरा संकल्प पवित्र है, और मैं दिव्यता की नई किरण के साथ जी रहा हूँ।

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