गीता मार्ग · 9.34
निरन्तर स्मरण
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥
भगवद्गीता 9.34 का अर्थ क्या है?
मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो और मुझे नमस्कार करो। इस प्रकार मुझमें पूरी तरह लीन होकर तुम निश्चित ही मुझे प्राप्त करोगे।
गीता 9.34 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?
भक्ति का अर्थ दुनिया छोड़ना नहीं, बल्कि दुनिया के शोर में भी ईश्वर की याद बनाए रखना है। जब हमारा मन परमात्मा से जुड़ा रहता है, तो जीवन की बड़ी से बड़ी मुश्किल भी छोटी लगने लगती है और मन में हमेशा आशा बनी रहती है।
कृष्ण की शिक्षा
श्रीकृष्ण कहते हैं कि अपने मन को मुझमें लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो और मुझे प्रणाम करो। जब तुम अपने मन और हृदय को पूर्ण श्रद्धा से मुझमें समर्पित कर दोगे, तब तुम निःसंदेह मुझे ही प्राप्त करोगे।
संकल्प
मैं अपने मन और हृदय को परमात्मा के चरणों में समर्पित करता हूँ। मैं प्रेम, श्रद्धा और भक्ति के साथ उनका निरंतर स्मरण करता हूँ और अपने प्रत्येक कर्म को उन्हें अर्पित करता हूँ।
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