🏠 गीता मार्ग
⚙

गीता मार्ग · 10.41

ईश्वरीय विभूति

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा। तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम्॥

भगवद्गीता 10.41 का अर्थ क्या है?

जो कुछ भी वैभवशाली, सुन्दर और शक्ति से भरा हुआ है, उसे तुम मेरे ही तेज के एक छोटे से अंश से उत्पन्न समझो।

गीता 10.41 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?

जब हम किसी ऊंचे पहाड़, बहती नदी या किसी गुणी व्यक्ति को देखते हैं, तो हमारी नजर उसकी सुन्दरता पर अटक जाती है। यह श्लोक सिखाता है कि उस सुन्दरता के पीछे छिपे असली कलाकार (ईश्वर) को देखें।

कृष्ण की शिक्षा

श्रीकृष्ण बताते हैं कि संसार का सारा आकर्षण वास्तव में परमात्मा की ही एक झलक है।

संकल्प

मैं इस जगत के प्रत्येक सुंदर, शक्तिशाली और अद्भुत रूप में परमात्मा की दिव्य चेतना और महिमा का दर्शन करता हूँ। मैं केवल वस्तु या व्यक्ति के बाहरी स्वरूप को नहीं, बल्कि उनके भीतर विद्यमान उसी परम चेतना को श्रद्धापूर्वक नमन करता हूँ।

सुझाव या प्रतिक्रिया दें · 10.41