गीता मार्ग · 16.14
शक्ति का नशा
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि। ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी॥
भगवद्गीता 16.14 का अर्थ क्या है?
अहंकारी मानता है: 'मैंने उस शत्रु को मार दिया, अब औरों को भी मारूँगा। मैं ही स्वामी हूँ, मैं ही भोगने वाला हूँ। मैं शक्तिशाली और सुखी हूँ।'
गीता 16.14 को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएं?
जब हमारे पास थोड़ी भी ताकत या सफलता आती है, तो हम दूसरों को छोटा समझने लगते हैं। यह श्लोक हमें उस 'मैं' के जहर से सावधान करता है जो हमें यह यकीन दिलाने लगता है कि हम ही इस दुनिया के मालिक हैं।
कृष्ण की शिक्षा
श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि जो दूसरों को हराने में सुख ढूंढता है, वह खुद के ही अहंकार से हार चुका होता है।
संकल्प
मुझे प्राप्त शारीरिक बल, बुद्धि, धन, सफलता और जीवन की सभी उपलब्धियाँ परमात्मा की कृपा हैं। इसलिए मैं इनके प्रति अहंकार नहीं रखता और अपनी क्षमताओं एवं संसाधनों का उपयोग समाज और दूसरों के कल्याण के लिए करता हूँ।
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